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Full text of "Saanp Aur Ham"

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पहला संस्करण : [987 

ग्यारहवीं आवृत्ति : 2000 (शक ।922) 

(0 जय एवं रोम व्हिटिकर, 986 

[76 ७॥9/०९5 /॥0प॥09 ()६५ (///0/) 

रु. 0.00 

निदेशक, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, ए-5, ग्रीन पार्क, 
नयी दिल्‍लली-400॥6 द्वारा प्रकाशित 


पुस्तकालय 


नेहरू बाल पस्त 


ओर हम 
जय एवं रोम व्हिटेकर 


सांप 






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अनुवादक 

पंवार 

चित्रांकन 

शेखर दत्तात्रेय 


हनुमानसिंह 





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ट्रस्ट, इंडिया 


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सांपों से संबंधित जानकारी 


सांप प्रकृति का एक लभावना जीव है। 
इनके विविध रंग, चाल-ढाल और 
रहस्यपूर्ण आदतें इन्हें अन्य जीबों से 
अधिक आकर्षक बनाती हैं। उन लोगों के 
लिये, जिनकी वन्य जीवन में विशेष रुचि 
है, सांप प्रकृति जगत का आश्चर्य जनक 
प्राणी है। इनके बारे में एक विशेष बात 
यह है कि ये हर जगह मिल जाते हैं। 
इनको देखने के लिए किसी विशेष पार्क 
या अभयारण्य में जाने की आवश्यकता 
नहीं होती। 

दुमछलला और दोमूहा जैसे कछ सांपों 
को पाला भी जा सकता है। विश्व के 
महान प्रकृति विज्ञानियों में से बहत से तो 
पालत्‌ जीवों के द्वारा ही जीव-जन्तुओं की 
ओर आकर्षित हुए। विज्ञान के बह॒त से 
मल्यवान विश्लेषण तो ऐसे शौकिया 
लोगों ने दिए जिन्होंने अपने पलंग के नीचे 
अजगरों को और जूते के डिब्बों में 
छिपकलियों को रखा। 

बहुत से मां-बाप अपने बच्चों को सांप 
को छने या उसके पास तक जाने को मना 
करते हैं। जहरीले सांपों से वास्तव में दूर 


+-- सांप के साथ बच्चा 





अहानिकर सुंदर ब्राइडल सांप 


रहना चाहिए। परन्तु नुकसान न पहुंचाने 
वाले सांपों को पकड़ने से सभी सांपों के 
बारे में एक सी धारणा दूर होती है। 
आपको यह सीखना चाहिए कि सांप 
डरावने नहीं होते और वे आपको हानि 
नहीं पहुंचाना चाहते। परन्तु, सबसे पहले 
नौसिखिया को यह सीखना चाहिए कि वह 
सांपों की पहचान ठीक-ठीक करे कि उनमें 
से किस से बच कर रहा जाए। 


सांपों का प्राकृतिक इतिहास 


कछ वर्ष पहले की बात है। रोम अपने 
मद्रास स्थित सर्प पार्क के लिए सांप एकत्र 
करने हेतु बरसात के मौसम में कर्नाटक के 
जंगलों में गया। सांझ ढलने से थोड़े समय 
पहले ही उसने पत्तों की खड़खड़ाहट 
सुनी। उसने नीचे की ओर देखा तो पाया 
कि एक्र काकली लंबी पंछ शीघ्रता से 
झाड़ियों में लुप्त हो गई। बिना किसी 
झिझक के उसने उस ओर छलांग लगाई 


और एक आश्चर्यजनक दृश्य देखा। 
उसके सामने 3.४ मीटर लम्बा नागराज 
पलटकर खड़ा हो गया। उसका मुंह खुला 
हुआ था। उसने खतरे पर तुरंत काब्‌ पा 
लिया। सांप पकड़ लिया गया और अब 
वह पार्क का विशेष आकर्षण बन गया है। 

विश्व के विषधर सांपों में नागराज 
सबसे लम्बा होता है और इसलिए 
भारतीय सांपों पर लिखी जाने वाली 
पुस्तक में उसका सबसे पहले उल्लेख 
होना वांछित है। यह लंबाई में 5 मीटर से 
भी ज्यादा तक पाया जाता है और तगड़े 


सबसे लम्बा विषधर सांप नागराज 





आदमी की भुजा जितना मोटा होता है। 
परन्तु दक्षिण अमेरिका में पाया जाने वाला 
अनाकोंडा नामक विषहीन सांप इससे भी 
अधिक लम्बा होता है। अनाकोंडा कई 
बार 9 मीटर से भी लम्बा होता है और 
हिरण को आसानी से निगल जाता है। 
भारत में सांपों में सबसे विशाल जालीदार 
अजगर होता है जो प्रायः 7 से 8 मीटर 
लम्बा होता है। इसी के परिवार का 
चट्टानी अजगर इससे तगड़ा होता है पर 
इसकी लम्बाई 6 मीटर ही होती है। दसरी 
ओर छोटा कृमि सांप है। यह विश्वास 
करना कठिन होता है कि यह एक सर्प है। 
इसे अधिकतर केंचुआ समझ लिया जाता 
है। सांप चमकीला, हरा और लम्बा हो 
सकता है तो हल्का, भरा और छोटा भी हो 
सकता है। यह पेड़ों पर भी रह सकता है, 
जमीन के काफी नीचे भी रह सकता है 
और यहां तक की महासागर में भी रह 
सकता है। यह चूहे अथवा चिड़िया खा 
सकता है और दसरे सांपों को भी भोजन 
बना सकता है। इसलिए जब आप सांपों 
के बारे में सीखना प्रारंभ करें तो यह बात 
ध्यान रखें कि सभी सांप न एक जैसे होते 
हैं न एक जैसे दिखाई देते हैं। 

सांप कभी बढ़ना बन्द नहीं- करते, 
परन्तु पैदा होने के दो वर्ष तक वे सबसे 
तेज बढ़ते हैं। जिस तरह जब बच्चे बढ़ते 

















अजगर और कृमि सांप 


हैं तो उन्हें नये कपड़ों और नये जूतों की 
जरूरत पड़ती है उसी प्रकार सांप भी एक 
बार अपनी पुरानी चमड़ी उतारते हैं। 
इनकी बाहरी चमड़ी की हल्की परत 
इतनी तंग हो जाती है कि एक नयी चमड़ी 
आने लगती है और पुरानी उतर जाती है। 
इसे केंचुली उतारना कहते हैं। केंचुली 
उतारने से कछ पहले सांप सुस्त और मन्द 

7 





धामिन सांप 


हो जाता है। जब केंचली उतर जाती है तो 
साप एकदम चमकीला और चस्त हो 
जाता है। प्राचीन यनानियों का यह 
विश्वास था कि इस प्रकार केंचली उतरने 
से सांप हमेशा जीवित रहता है। 
हमारी तरह सांप भी विविध प्रकार का 
भोजन करते हैं। वे क्‍या खाते हैं यह इस 
पर निर्भर है कि वे कहां रहते हैं और वे 
कितने बड़े हैं। उदाहरण के लिए पानी में 
रहन वाला सांप आसानी से मेंढक और 
मछलियों को पकड़ कर निगल जाता है। 


पेड़ पर रहने वाला सांप धीरे से 
छोटी-छोटी चिड़ियों को उनके घोंसलों से 
पकड़ता है। जमीन में रहने वाले 
अधिकांश सांप चहों को अपना भोजन 
बनाते हैं और इस प्रकार वे हमारे लिए 
लाभकारी सिद्ध होते हैं। 

सांपों को प्रसन्न करना आसान है। वे 
जो कछ खाते हैं, वह न मिले तब भी भखे 
नहीं रहते। हमने यह भी देखा है कि नाग 
एक मीटर लम्बी गोह को भी निगल जाता 
है। एक ने तो मूर्खतावश एक कौड़िल्ला 


ही पकड़ लिया। उसकी चोंच नाग के गले 
में अटक गई और बड़ी सावधानी से 
निकाली गई। 

अपनी मजबूत मांसल देह और बड़े 
आकार के कारण अजगर बहत प्रकार के 
जीव-जन्तुओं को अपना शिकार बनाते 
हैं। सर्प पार्क में इन्हें मुर्गियां और घंस 
खिलाई जाती हैं, जंगल में इनका भोजन 
और मजेदार होता है। बड़े अजगरों के 
बार में तो कहा जाता है कि वे तेंदए और 
साभर को भी पचा जाते हैं। सांपों के 


बैबलर (तृती) को खाते हुए सामान्य दोम॒हा 





शरीर में वसा संग्रह करने की प्रणाली 
होती है इसलिए उन्हें प्रतिदिन आहार की 
आवश्यकता नहीं पड़ती। छोटे सांप 
तीन-चार दिन में एक बार खाते हैं। 
परन्तु बड़े सांप तो कई-कई सप्ताह में 
एक बार खाते हैं और यहां तक कि 
कई-कई महीने बिना खाये बिता सकते 
हैं। 

सांप अपना भोजन चबाते नहीं हैं। 
वास्तव में उनकी खाने की आदतें रुचिकर 
नहीं हैं। वे अपना भोजन साबुत निगलते 








खुले मुंह वाला सांप 


हैं। प्रायः: हम देखते हैं कि सांप इतना बड़ा 
मेंढक या चहा भी पकड़ लेते हैं कि उसे 
संभालना कठिन होता है। पर सांप अपना 
मुंह इतना चौड़ा लेता है कि आप कल्पना 
नहीं कर सकते। इनका गला एक सख्त 
जुर्रावब की तरह फैलता जाता है और 
धीरे-धीरे, पर निश्चित रूप से, भोजन 
सांप के गले से नीचे उतरने लगता है। 
अन्दर की तरफ नुकीले दांत भोजन को 
नीचे की ओर खिसकाने में मदद करते हैं। 


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सांप अपनी नस्ल की सर्पिणी के साथ 
ही सहवास करते हैं। प्रजनन काल में 
सर्पिणी अपनी गंध ग्रंथि से भूमि पर चलते 
समय पीछे हल्की गंध छोड़ती जाती है। 
इससे सांप को सर्पिणी खोजने में सहायता 
मिलती है। कभी-कभी देखा गया है कि 
कई सांप एक ही सर्पिणी के पीछे पड़े रहते 
हैं। कछ सर्पिणी अंडे देती हैं। अंडे सफेद 
और चीमड़ी होते हैं जिससे सेने के समय 
बच्चों को उनमें से निकलने में आसानी 


होती है। सर्पिणी अंडे देने के लिए सरक्षित 
और ढंके हुए स्थान खोज लेती है। कछ 
प्रजातियों की सर्पिणी अंडों से बच्चे 
निकलने तक उन्हीं के पास रहती हैं जब 
कि कुछ अंडों को उनके भाग्य पर छोड 
कर चली जाती हैं। इससे गोह, नेवले और 
अन्य कई प्रकार के जन्त उन पर आक्रमण 
कर देते हैं। 

पर सभी सर्पिणी अंडे नहीं देती हैं। 
कुछ बच्चे जनती हैं। वास्तव में ये 

अंडजजीव प्रजक'' हैं। इसका अर्थ होता 


है कि मादा के शरीर के अंदर ही अंडे सेने 
की क्रिया होती है। हरा, वाइपर, समद्री 
और दोमु॒हा सांप इसी प्रकार पैदा होते हैं। 
इस प्रकार जन्में सांप केंचुए की तरह छोटे 
अथवा एक फट तक लम्बे हो सकते हैं जो 
भिन्न-भिन्न प्रजातियों पर निर्भर है। 
आरंभ में इनके लिए सरक्षित रहना 
कठिन होता है। बहत से शत्रओं से इन्हें 
सामना करना होता है। इनमें कई प्रकार 
के पक्षी, कछए, नेवले और बलफ्रॉग 
(बड़ा मेंढ़क) प्रमुख हैं। शिश सांप छोटे 


उड़ने वाले सांप का बच्चा 





मेंढ्रकों, चुहियाओं और कीड़े-मकोड़ों का 
भक्षण करते हैं। प्रकृति का समय निर्धारण 
इतना सटीक है कि आमतौर पर सांप के 
बच्चे बरसात के प्रारंभ में पैदा होते हैं जब 
बेंगची, मछली और कीड़े-मकोड़े प्रचर 
मात्रा में होते हैं। 

सांप का सबसे बड़ा शत्र आदमी है। 
वह सांपों को बिना जरूरत मारता है, 
उसके रहने के स्थान के आसपास 
हानिकारक जहर छिड़कता है और जंगलों 
को, जहां कि वे रहते हैं, निर्दयता से 
काटता है। सांप के कई प्राकृतिक शत्रु भी 
हैं। इनमें सबसे विख्यात नेवला है। हमने 
मगरमच्छ को एक बड़ा धामिन 
(रेडस्नेक) पकड़ कर खाते देखा है और 
गोह को मरा सांप खाते देखा है। कई 
शिकारी पक्षी (जैसे बाज) और कई प्रकार 
के बगले आदि भी सांप को मारकर खा 
जाते. हैं। इनमें से कछ तो घोंसलों में रखे 
अंडों या चूजों की र प से रक्षा करने के 
लिए उस पर आक्रमण करते हैं। हाल ही 
में एक मित्र एक फण फैलाकर बैठे हुए 
एक नाग का चित्र ले रहा था। अचानक 
आकाश से एक चितकबरे ओलट (छोटे 
उल्लू) ने राकेट की तरह अपने पंजों से 
नाग के सिर पर झपटा मारा। सांप उसी 
समय मर गया। कभी-कभी प्रकृति की 
अन्य घटनाएं भी क्रर बन जाती हैं। 
2 





साप को खाते हार बंगला 


सांपों की ज्योति बहत अच्छी नहीं 
होती। प्रायः ये अपने पास की वस्त्‌ को भी 
नहीं पहचान पाते। कई बार हमने पेड़ों 
और झाड़ियों पर जब नजदीक से सांपों को 
चढ़ने देखा तो पाया कि वे धीरे-धीरे 
हमारे ही ऊपर चढ़ गये। एक बार एक 
नाग ने रोम को शाखा समझा और एक 
पेड़ से दूसरे पेड़ तक जाने के लिए उस पर 
से गृजरा। शिकार करते समय सांप 
अपनी सूंघने की शक्ति का उपयोग करते 
हैं जो काफी तेज होती है। यह एक 
दिलचस्प तथ्य है कि सूंघने के लिए सांप 


नाक का नहीं जीभ का इस्तेमाल करते हैं। 
रेंगते समय सांप की जीभ जमीन की 
वस्तुओं से गंध लेती चलती है और वह 
इस प्रकार अपने शिकार को ढुंंढता है। 
लोगों का विश्वास है कि सांप सुनता है 
और यहां तक की संगीत पर झमता है। 
संपेरे की बीन पर सांप को लहराते देख वे 
सोचते हैं कि सांप संगीत की धुन पर नाच 
रहा है। यह वास्तव में सच नहीं है। 


दरअसल नाग उस आदमी की बीन से 
भयभीत रहता है और जैसे संपेरा हिलता 
डलता है, सांप भी उस पर कड़ी नजर रखे 
हुए हिलता रहता है। यह पाया गया है कि 
सांप अपने फेफड़ों की मदद से कछ वायु 
जन्य आवाजों को सुन लेते हैं परन्तु वे 
अधिकतर कम्पन के कारण प्रतिक्रिया 
करते हैं। अपनी सुनने की कम शक्ति पर 
सांप बहुत कम भरोसा करते हैं। 


सांपों की रक्षा किस लिए ? 


एक दिन हम मद्रास के बाहर एक 
झाड़ीदार जंगल में घूम रहे थे। हमने देखा 
कि एक किशोर ग्वाले ने एक अहानिकर 
सांप को ट॒कड़े-टुकड़े कर दिया है। हमने 
उससे पूछा, तुमने इसे किसलिए मारा? 
उसने जवाब दिया कि उसे वह दिखाई 
दिया था। और यह एक सामान्य कारण है 
कि जहां कहीं सांप दिखाई देता है, लोग 


उसे अकारण मार डालते हैं, बिना यह 
जाने कि वह उनका कोई नुकसान करेगा 
या फायदा। बहुत से लोग सांपों से 
भयभीत रहते हैं और उनके बारे में 
तरह-तरह के किस्से सुनाते हैं। आपने 
बह॒त से लोगों से सुना होगा कि उन्होंने 
सांप मारा है। डाकिये, माली, खेत पर 
रहने वाले आपने चाचा या सकल जाते 
अपने भाई से सांप मारने का वृतान्त बड़ी 
बहादुरी के साथ क्‍या आपने नहीं सुना? 
हम सांपों को क्‍यों नहीं रहने देते? 


सांपों पर आक्रमण मत करो 





सांपों को मारने का एक अन्य कारण 
भी है-- उनकी खाल। सांपों की खालों को 
चमड़े की तरह संसाधित करके 
तरह-तरह की वस्तुएं जैसे बटएं 
हैण्डबैग, बैल्ट और जते बनाये जाते हैं। 
आजकल सांप की खाल के निर्यात की 
अनमति नहीं है तो भी इसका गैरकाननी 
व्यवसाय जारी है। यदि आप कहीं किसी 
व्यक्ति को सांप की खाल से बनी वस्त 
खरीदते देखें तो उसे ऐसा न करने के लिए 
आग्रह करें। ऐसा करके आप न केवल 


किसी नाग, दोमहा, धामिन या पनिहा 
सांप की जान ही बचाते हैं अपित देश 
सेवा भी करते हैं। यदि सांप की खाल का 
उपयोग करना ही है तो यह वैज्ञानिक 
तरीके से करना चाहिए, उनकी संख्या का 
समुचित अध्ययन करने के बाद। इसे 
आजकल वन्य जीव साधन प्रबन्ध 
कहा जाता है। जिस प्रकार किसान अपनी 
फसल का प्रबंध करता है, जीव जन्तुओं 
को भी सुरक्षित स्थान पर या बाड़ों में 
पाला जाना चाहिए और उनकी चुनी हुई 


सर्प चर्म का बाजार-अब सापों को उनकी खाल के लिए मारना अवैध है 





संख्या को ही खाल, मांस या अन्य उत्पादों 
के लिए मारा जाना चाहिए। यह तरीका 
आमतौर पर मारे जाने से काफी भिन्न है। 

सांप हमारे लिए किस प्रकार 
लाभदायक है? वास्तव में ये बहत 
मूल्यवान जीव हैं। यह इसलिए क्‍योंकि ये 
चूहे खाते हैं। चूहे, जो प्रति वर्ष भारत की 
आधी खाद्य उपज को चट कर जाते हैं। 
आप चूहों द्वारा किये जाने वाले नुकसान 
को भली प्रकार तभी जान. पायेंगे, जब 


आप फसल कटाई के समय खेतों पर जाएं 
और देखें कि चूहे किस प्रकार अपने बिलों 
में अनाज का भण्डार बनाते हैं। चहे खाने 
वाली इरूला जनजाति के लोग अक्सर 
चूहे के एक बिल में से 0 कि. ग्रा. के 
लगभग धान या मूंगफली निकाल लेते हैं। 
कठिन परिश्रम करके चूहे अपने मंह में 
अनाज भर-भर लाते हैं और उसे अपने 
बिलों में शुष्क मौसम के दौरान खाने के 
लिए जमा करते रहते हैं। 


मूषक के बिल से अनाज एकत्र करते हुए इरूला लोग 


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चहें खाता हआ नाग 


वास्तव में कछ अन्य प्राणी भी हैं जो 
चूहे खाते हैं। कछ पक्षी, छिपकली, 
मगरमच्छ, सियार और बहुत से अन्य। 
परन्तु सिर्फ सांप ही ऐसा प्राणी है जो चूहों 
को ठेठ उनके बिलों तक पीछा करके 
पकड़ कर खा जाता है। आमतौर पर सांप 
न केवल चूहे खाता है बल्कि उसके बिल 
पर भी अधिकार जमा लेता है। काफी 
वर्षों से हम सांपों की मृषकों को पकड़ने 
और मार देने की क्षमता की प्रशंसा करते 
आये हैं। हमने अजगरों को घूंस पर विद्युत 
गति से झपट कर उसे अपनी पृष्ट कंडली 
में दबाते, पेड़ पर रहने वाले छोटे सांप को 
चहियों को पकड़ते और दुम॒हा को चूहों के 
बिल में घुसते देखा है। प्रकृति ने चूहों की 
संख्या पर नियंत्रण रखने के जो तरीके 
बनाये हैं वे आधुनिकतम प्रौद्योगिकी के 


आ जाने पर भी मानवीय तरीकों की 
अपेक्षा बेहतर हैं। चहे शीघ्र ही आदमी 
द्वारा भूमि पर डाले गये जहरीले पदार्थों 
को पचाने लगते हैं और उन्हें बेअसर कर 
देते हैं। यही नहीं वे तुरंत यह भी भांप 
जाते हैं कि उन्हें पकड़ा जा रहा है और 
उससे बचने के तरीके सीख जाते हैं। 
हमारा अपना खुला घर पड़ोस के चूहों को 
आमंत्रण देता है और जब हम उन्हें 
पकड़ना आरंभ करते हैं तो वे शीघ्र ही 
पकड़ने में नहीं आते! वे शीघ्र ही यह 
सीख जाते हैं कि पनीर या रोटी का टुकड़ा 
बिना खतरे के किस तरह लेकर भागा 
जाए। हमारी समस्या तब सुलझती है जब 
हम कछ धारमिन सर्प उन्हें मारने को छोड़ 
देते हैं। इस प्रकार हमें सांप को उसका 
परस्कार देना चाहिए। वह अब तक के 


7 


खोजे गये चूहा नियंत्रकों में सबसे प्रभावी 

| 

एक दूसरे सीधे तरीके से भी सांप 
आदमी की मदद करते हैं। इनका जहर 
एक महत्वपूर्ण रासायनिक तत्व है जिससे 
कई प्रकार की दवाइयां बनाई जा सकती 
हैं। नाग के जहर से “'कोबरोक्सिन'' 
नामक दवा बनाई जाती है जो तीकब्र दर्द 
निवारक औषधि है। 

सांप के जहर में कई प्रकार के विषाक्त 
तत्व, प्रोटीन और एन्जाइम होते हैं। यह 
जहर सांप के गालों के अन्दर विद्यमान दो 
लाल-पग्रंथियों में निर्भित होता है। जब 
सांप किसी को काटता है तो इसके दो 
खोखले विषदंतों से यह जहर उसमें प्रविष्ट 
कर जाता है। इस प्रकार इसके पहले कि 
इसका शिकार भागे या अपनी रक्षा करे 
सांप .उसे मार देता है। यह बह॒त 
महत्वपूर्ण है अन्यथा सांप के लिए एक 
चूहा भी शक्तिशाली शत्रु बन सकता है। 
कई बार जब सांप चूहे को पकड़ता है वह 


8 





नाग का सिर और विषदन्त तथा विष 
ग्रंथ की स्थिति 


अपने दांतों से सांप को बरी तरह काट 
लेता है। 

सांप के विष का एक अन्य उपयोग 
उसके द्वारा तैयार होने वाला सीरम है 
जिसे सांप के काटने पर उपचार में लाया 
जाता है। 

जीवन श्रृंखला, जो जीवों और पौधों को 
एक साथ जोड़ती है, में सांप जैसे परभक्षी 
जीव बहुत महत्वपूर्ण कड़ी हैं। इस 
श्रृंखला में एक कड़ी की हानि भी पृथ्वी के 
पूरे जीवन के लिए हानिकर हो सकती है। 


सांपों के बारे में धारणायें 


मित्र और संबंधी लोग सांपों के बारे में 
सदैव चमत्कारी कहानियां सनाते रहते हैं। 
यह सांप अपनी पंछ से काट सकता है” 
या यह लोगों की आंखों पर झपटता है 
और उन्हें निकाल लेता है''। यदि आपको 
किसी विषय की जानकारी नहीं है तो यह 
आसान है कि आप उस अजनबी की बात 
पर विश्वास कर लें। परन्‍्त जब आप 
सांपों के प्राकृतिक इतिहास को जान लेते 
हैं तब आपको पता चलता है कि ये 
मन-गढ़न्त कहानियां कितनी हास्यप्रद हैं। 
उदाहरण के लिए बहत से लोगों का 

' विश्वास है कि सांप दध पीते हैं। सर्प पार्क 
में आने वाले बहत से लोग सांपों को 
पिलाने के लिए अपने साथ दध लाते हैं- 
जिसे मैं लेकर कर्मचारियों को कॉफी 
बनाने के लिए दे देता हंं। एक बहत 
प्यासा सांप तो दध की घंट ले सकता है 
पर वास्तव में यह उसका प्राकृतिक भोजन 
नहीं है। जंगल में सांप को दध कहां से 
मिलेगा। परन्त बहत से लोग यह तर्क देते 
मिल जायेंगे कि उन्होंने सांप को गाय या 
बकरी के थनों से दध पीते देखा है। 
लेकिन वे लोग यह भल जाते हैं कि सांप 


के इतने तेज दांत होते हैं कि गाय या 
बकरी उन्हें सहन नहीं कर सकती। एक 
दूसरी किंवदन्ती यह है कि नाग धामिन के 
साथ सहवास करते हैं। यह सही नंहीं है। 
सांप अपनी ही प्रजाति की मादा के साथ 
सहवास करते हैं। हां जहां इन्हें बंदी बना 
कर रखा जाये वहां संकर प्रजनन मिल 
सकता है, पर प्राकृतिक स्थिति में ऐसा 
नहीं होता। 

इन मन गढ़न्त बातों से सांपों को बहत 


'हानि पहंचती है। आसानी से पाला जा 


सकने वाला, सीधा सादा दिखने वाले हरा 
सांप के बारे में प्रचलित धारणा- कि यह. 
आंखें निकाल लेता है, की वजह से यह 
लोगों के कोप का भाजन बनता है। तमिल 
भाषा में इसे कन्‍न कट्ठी पंब (आंख 
निकालने बाला सांप) कहते हैं। एक दिन 
जब रोम इस सांप को हाथ में लेकर 
बच्चों को समझा रहा था कि यह 
हानिकारक नहीं है तो वह एकदम उसकी 
नाक पर झपट पड़ा। तभी बच्चे चिल्लाये 
कि यह आंख निगलने वाला नहीं नाक 
निगलने वाला सांप है। कांसे जैसी पीठ 
वाला पेड़ पर रहने वाला सांप जो कभी 
मुश्किल से ही काटता है और जहरीला 
नहीं होता एक दसरी प्रकार की कहानी से 
जुड़ा है। इसके बारे में कहा जाता है कि 
यह किसी व्यक्ति को काटने के बाद पेड़ 





हरा सांप 


की चोटी पर चढ़ जाता है और उस 
व्यक्ति के अंतिम संस्कार को वहां से 
देखने की प्रतीक्षा करता है। ऐसी 
कहानियां बार-बार कही जाती हैं और 
शिक्षित लोग भी इसमें शामिल होते हैं। 
सांप के ज्यादा दिमाग नहीं होता और वह 
अपने आहार, आराम और शत्रु से बचाव 
से अधिक नहीं सोचता। यह अन्य पशुओं 
या आदमी जितना आगे सोचकर योजना 
नहीं बनाता। यह जो भी करता है अपनी 
सहजता से करता है। इस प्रकार इसके 
बारे में यह कहना भ्रामक है कि यह 
बदला लेता है और अन्य सांपों से वैमनस्य 


20 


का झांसा 


रखता है। सांपों के पास थोड़ा और सीधा 
दिमाग होता है जो उसे बताता है कि चूहा 
कहां से या पानी कहां मिल सकता है, 
इससे पेचीदा कछ नहीं। 

अन्य देशों में भी सांपों के बारे में 
विभिन्न प्रकार की मनगढ़न्त बातें प्रचलित 
हैं। अमेरिका में छल्ला सांप के बारे में 
बातें की जाती हैं। कहा जाता है कि यह 
अपनी पूंछ को अपने मुंह में दबा कर एक 
छलला सा बन जाता है और पहाड़ी पर से 
पहिये की तरह नीचे लुढ़कते हये लोगों का 
पीछा करता है। भारतीयों की तरह ही 
अमेरिकी भी यह मानते हैं कि सभी सांप 


जहरीले होते हैं। 

सांपों के बारे में इन कपोल कल्पनाओं के 
प्रचलित होने का सीधा सा स्पष्टीकरण हो 
सकता है। शायद किसी सताये हुए हरा सांप 
ने किसी व्यक्ति की आंख पर झपट्टा मार 
दिया हो। हालांकि उसकी मुलायम नाक 
कोई हानि नहीं पहंचा सकती, पर उससे 
सांप के बारे में यह प्रचलित हो गया कि यह 
आंख निकालने वाला सांप है। इस व्याप्त 
विश्वास के पीछे कि सांप के जोडे में से किसी 
एक के मारे जाने पर उसका दसरा साथी 
वहां आता है और मारने वाले से बदला लेता 
है, यह बात हो सकती है कि सभी सांपों में 
गंध होती है और जब वे गस्से में होते हैं तो 
इसे छोड़ते हैं। यदि वह जख्मी होता है या 


मारा जाता है तो अपने पीछे गंध छोड़ता है 
जिसे संघते हुए उसके समीप ही कहीं रह रहे 
अन्य सांप उसकी खबर लेने उस स्थान पर 
आ सकते हैं। यह निश्चित है कि वे सांप 
को मारने वाले से बदला लेने को नहीं 
आते। 

अन्य अंध विश्वासों के अंतर्गत यह भी 
प्रचलित है कि सांप लोगों को बीमार कर देते 
हैं। यह आम तौर पर कहा जाता है कि 
दोम॒हा के कारण कप्ठ रोग होता है। सांपों के 
बारे में निश्चित जान प्राप्त करने के लिए 
यह आवश्यक है कि सांपों संबंधी किसी 
पुस्तक का अध्ययन किया जाए या ऐसे 
व्यक्ति से जानकारी ली जाए जिसने सांपों 
का अच्छी तरह अध्ययन किया हो। 


2 





कद पट जो भर 
कक ॥ जी: आर का 


खाक, अंक 7 कै | 


सांप पकड़ने वाली जातियां 


बह॒त से लोग सांप को देखते ही भाग खड़े 
होते हैं। परन्तु ऐसे भी लोग हैं जो सांपों 
को खोजते रहते हैं। जब भारत से लाखों 
रुपये की सांप की खाल का निर्यात किया 
जा रहा है तो निश्चय ही कछ लोग 
व्यावसायिक तौर पर सांप पकड़ने वाले 
हैं। ये लोग सांपों को पकड़ कर उनकी 
खाल बेचकर अपनी जीविका चलाते हैं। 
ये मुख्यतः: तथा धरती पर रेंगने वाले सांप 
जैसे धामिन, नाग, दुबोइया, अजगर और 
दोमुहा हैं। 

दक्षिण भारत में तमिलनाडु की इरूला 
जनजाति ने निर्यात के लिये सांप की खाल 
की सबसे अधिक आपूर्ति की। हमने दस 
वर्ष तक इन लोगों के बीच काम किया। 
सांप प्राप्त करने की इनकी जादुई प्रतिभा 
प्रशंसनीय है। इरूला जाति के हमारे 
दोस्त चोकलिंगम और राजेन्द्रन रमन 
और वेल्लाई और बहुत सारे अन्य जितना 
सांपों के बारे में जानते हैं उतना हम और 
आप नहीं। इनमें से कोई भी रेत पर पड़ी 
हल्की लकीर को देखकर यह बता सकता 
है कि उस मार्ग से छोटा नाग गुजरा था 
और वह भी लगभग दस मिनट पहले। 


+*-- सांपों के साथ इरूला 


वह उसका कोई सौ मीटर पीछा करके 
झाड़ियों में बने चूहे के बिल तक पहुंच 
जाता है। वह वहां सब्बल से खुदाई आरंभ 
करता है। खोदते-खोदते शीघ्र ही नाग के 
घर का पता चल जाता है। बिल में जाने 
का एक सीधा रास्ता नजर आता है और 
अन्त में नाग की पूंछ दिखाई पड़ती है। 
क्रद्व नाग को खींच लिया जाता है, वह 
अपने दोपहर के आराम के समय में 
व्यवधान पड़ते देख फफकारने लगता है। 
अब सांप की खाल के निर्यात पर रोक 
है। अब इरूला लोग सांप के जहर के लिए 
उसे पकड़ते हैं। इसे पुणे के सीरम 
संस्थान, मद्रास के किंग संस्थान और ऐसे 
ही अन्य संस्थानों को बेचा जाता है जहां 
विषरोधी सीरम तैयार किया जाता है। 
इरूला लोगों ने 'इरूला सांप पकड़ने वाली 
सहकारी समिति नामक संस्था का गठन 
किया है जहां ठंडे पंक पात्रों में सांपों को 
लाकर रखा जाता है। इनका तीन बार 
विष निकाला जाता है। सांप को गरदन से 
पकड़कर एक रबर शीट से ढंक दिया 
जाता है। उसंमें एक गिलास लगा होता 
है। क्रोध और भय से सांप अपने बचाव के 
लिए शीट में दंश मारता है और विष 
उगलता है। इस प्रकार सप्ताह में तीन 
बार उसका जहर निकाला जाता है। बाद 
में उसे वापस जंगल में छोड़ दिया जाता 





नाग से विष निकालना 


है। निकाले गये जहर को सुखा कर बेच 
दिया जाता है। 

अन्य राज्यों में भी इसी प्रकार की 
जातियां हैं जो सांप पकड़ती हैं। महाराष्ट्र 
के महार लोग आरी जितने छाटे वाइपर 
सांपों को पकड़ते हैं और विषरोधी सीरम 
बनाने वाली संस्था हॉफकिन संस्थान को 
देते हैं। 

उड़ीसा में भुवनेश्वर के बाहर पटिया 
नामक एक छोटा गांव है जहां संपर रहत 
हैं। इन लोगों को दास कहा जाता है। य 
लोग उड़ीसा के तटवर्ती क्षेत्र में कच्छ के 
24 


दलदल में जीवित नागराज को पकड़ने में 
विशषता प्राप्त हैं। ये लोग सांपों के 
विषदन्त निकाल देते हैं और उन्हें बड़े 
शहरों में दिखाकर पैसे एकत्र करत हैं। 

कछ ऐसे भी सांप पकड़ने वाल हैं जा 
अक्सर हमारे सामने आते रहते हैं। बंबई 
में एक पडोसी ने अपने घर के पास बगीचे 

छपे कछ सांपों से छुटकारा पाने के लिए 
ऐसे ही एक संपेरे को बलाया। हम भी यह 
दृश्य देख रह थ। सपेर न सबको पीछे 
हटकर खड़ हाने को कहा। वह बीन 
बजाता हुआ बगीचे के चारों ओर घमा। 


अचानक वह एक झाड़ी पर झपटा और 
एक छंटपटाते नाग को पंंछ से पकड़ 
लाया। वहां खड़ा प्रत्येक आदमी अचरज 
से देख रहा था। वह संपेरा मित्र के बगीचे 
से एक-एक करके चार सांप पकड़ लाया। 
ये सब हानिरहित दोम॒हा थे। उसने 
बताया कि ये प॒दाक सांप हैं। जब उन 
नागों की अच्छी तरह जांच की गई तो 
पाया कि वे सब विषदन्त रहित हैं। वह 
चालाक व्यक्ति अपने ही सांप लाया हआ 
था। | 
आप अक्सर जिन सपेरों को गलियों में 
बीन बजाते अपने पिटारों में सांप रखे 
घमते देखते हैं वे वास्तव में सांप पकड़ने 
वाले नहीं होते। ये लोग सांप पकड़ने 
वालों से नाग खरीदते हैं और स्रक्षा के 
लिए उसके विष-दन्त निकाल देते हैं। कई 
बार सांप के मंह पर दोनों तरफ से बरी 
तरह टांके लगा दिये जाते हैं। इससे वह 
बीमार हो जाता है। बिना दांत के वह खा 
नहीं सकता और एक या दो महीने में मर 
जाता है। जिस नाग को आप संपेरे की 
बीन की धन पर नृत्य करते देखते हैं 
वास्तव में वह बहुत बीमार, भयभीत और 
जीवन से थका हुआ प्राणी होता है। 
विश्व के बहत से देशों में सांपों की 
पूजा की जाती है। भारत में भगवान शिव 
और विष्ण को प्रायः सर्प के साथ देखा 





नाग के साथ सपेरा 


जाता है। सर्प वंश की देवी भी यहां है। 

महाराष्ट्र के बत्तीस शिराला में नाग 
पंचमी के अवसर पर जब फसल की 
कटाई होती है स्त्री, पुरूष और बच्चे सभी 
मिलकर नये पकड़े गये नाग की फलों, घी 
और धन से पूजा करते हैं। संयुक्त राज्य 
अमेरिका में ईसाइयों के ऐसे वर्ग हैं जो 
मानते हैं कि यदि आप का विश्वास पक्का 
है तो जहरीले सांप भी आप को नहीं 
काटेंगे। वे उस जगह पर मिल कर बैठक 
करते हैं जहां रेटल स्नेक (फभनभनिया) 


नाग एंचमी त्यौहार पर संपेरे 





ओर अन्य जहरीले सांपों को बकसों में 
रखा जाता है। लोग आगे कदम रखते हैं, 
अपने हाथ बकसों के अन्दर डालते हैं और 
सांपों को बाहर निकालते हैं। उनका 
विश्वास है कि यदि सांप काट भी ले तो 
भी आदमी मरेगा नहीं। यह कई बार 
लोगों की मौत का कारण बन जाता 
त्रै। 

बर्मा के शान लोगों द्वारा एक अन्य 
विस्मयकारी धार्मिक कत्य किया जाता है। 
एक कशल सांप पकड़ने वाला जंगल में 





जाता है और एक विशाल नागराज को 
पकड़ कर लाता है। एक विशिष्ट दिन पर 
इसे खले में रखा जाता है जिसके चारों 
ओर लोग घेरा डाल कर खड़े हो जाते हैं। 
तब पिटारा खोला जाता है। नागराज 
धीरे-धीरे अपना सिर उठाता है और परी: 
तरह अपना फन फैला देता है। तब एक 
लड़की आगे बढ़ती है और उस पर प्री 
तरह झुक जाती है। इसके बाद वह उसके 
फन को चमती है। 

कछ लोग सांप खाते भी हैं। हांगकांग 
में ऐसे भोजनालय हैं जहां आप जीवित 
सांपों में से किसी को भी चुन सकते हैं। 
आपके चने हुए सांप को फिर आपके लिए 
पका कर परोसा जाता है। इंडोनेशिया के 
ईरीयन जया प्रदेश में रोम कोरोडेसिस ने 
रोफर नदी पर दावत के लिए आमंत्रित 
किया। पकवानों में एक भाप में सिका 
हआ अजगर भी था। (उसने बताया कि 
उसका स्वाद मुर्गे जैसा था)। हमारे अपने 
देश में उत्तर पर्व कें चकमा, और दक्षिण 
पश्चिम के पोलियार जनजाति के लोग 
अपने भोजन में नियमित रूप से सांप को 
शामिल करते हैं। दूसरे लोगों के लिए 
इसकी वसा और मांस मुल्यवान औषधियां 
है। 

सांपों के विषय में महत्वपूर्ण अनुसंधान 
करने के लिए क॒छ नाम विख्यात हुए हैं। 


न्ययार्क के ब्रांक्स चिड़ियाघर के क्यूरेटर 
(संग्रहालय ध्यक्ष) रेमण्ड डिटमार्स ने सांपों 
को लोकप्रिय बनाने और युवाओं को इस 
विषय का अध्ययन करने के लिए 
आकर्षित करने में सर्वाधिक कार्य किया 
है। उनकी पस्तक विश्व के सर्प को 
अमेरिका में सांपों के विषय में सीखने वाले 
युवा लोगों के लिए बाईबल माना जाता 
है। ब्रिटिश सेना के एक अधिकारी पी जे 
पी आयोनिड्स, जो अब अफ्रीका में बस 
गये हैं, एक शिकारी और सांप पकड़ने 
वाले थे; अपने साहस के लिए प्रसिद्ध हैं। 
इन्होंने अफ्रीका के भयंकर मम्बा, 
बूससस्‍्लैंग, पफ एडर और इसी प्रकार के 
अन्य सांपों को विश्व चिड़िया घरों और 
विष केन्द्रों के लिए पकड़ा। 

परन्तु अब भी सांप पालने या पकड़ने 
वालों के गुरु के रूप में बिलहास्ट को माना 
जाता है। क्लोरिडा के मियामी में इनका सर्प 
पार्क है। इन्होंने विश्व के लगभग सभी 
विषधारी सांपों का जहर निकाला है। भारत 
और पाकिस्तान के नाग व करैत, थाईलैण्ड 
के नागराज, अफ्रीका के पफ एडर और 
मम्बा, आस्ट्रेलिया के टाइगर सांप और 
टाईमान और सैकड़ों अन्य ऐसे हैं। परन्तु 
जिस प्रकार 4५% मीटर लम्बे विशाल 
नागराज को पकड़ कर उसका विष 
निकालते हैं, उसके लिये वे प्रसिद्ध हैं। वे 


55 पं 


पलक पेन पतक >2 


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नागराज को उसके पिटारे से निकालते हैं 
और बिना किसी चिमटे या सांप पकड़ने के 
हक की सहायता के अपने हाथों से उसे पकड़ 
लेते हैं। वे बार-बार दर्शकों को अपने दक्ष 
और शानन्‍्त तरीके से विश्व के भयंकरतम 
सांपों का सामना करते हये चमत्कुत करते 
हैं। बिलहास्ट के अतिरिक्त विश्व में कोई 
भी आदमी शायद ऐसा नहीं है जो नागराज 
के काटने पर बच गया हो। आप इस बारे में 
क्या सोचते हैं कि वह यह सब कैसे कर पाते 
हैं? जब वे कम आय के थे तभी से उन्होंने 
सर्प विष के टीके लेने आरंभ कर दिये, ठीक 


<-- नाग के साथ बिलहास्ट 


उसी प्रकार जिस तरह हम आंत्रज्वर या हैजे 
आदि के टीके लेकर उसके प्रतिरो धी हो जाते 
हैं। उन्होंने धीरे-धीरे खुराक की मात्रा तब 
तक बढ़ाना जारी रखा जब तक उनका 
शरीर सभी प्रकार के जहर का प्रतिरोधी 
नहीं हो गया। किसी ने मजाक में कहा कि 
उनके शरीर में इतना विष है कि ' अच्छा है 
वे किसी को काटें नहीं '_ कछ भी कहो, इस 
तरीके से वे नागराज के काटने पर भी 
जीवित रह सकते हैं, नहीं तो उनका बचना 
असंभव था। उन्हें जहरीले सांपों ने कम से 
कम सौ बार काटा है। 


विषधर सांप 


चार प्रकार के प्रमख सांप 
भारत में सांपों की 236 प्रजातियां हैं। 
आकार, रंग और आदतों में ये एक दसरे 
से काफी भिन्न हैं। यद्यपि इनमें से 50 के 
लगभग जहरीली प्रजातियां हैं पर 
अधिकतर से आदमी के जीवन को कोई 
खतरा नहीं है। उदाहरण के लिए बंगाल 
में पाया जाने वाला भयंकर करैत सांप 
म॒श्किल से ही काटता है। सांप पालने 
वाले आमतौर पर इन्हें गरदन से पकड़ते 
हैं और रबर की नली जितना खतरनाक 
मानते हैं जिनसे सावधान रहने की जरूरत 
है ऐसे चार प्रमुख जहरीले सांप हैं : नाग, 
करेत, दुबोइया और अफाई। भारत के ये 
चार प्रमुख जहरीले सांप हैं जिनके संपर्क 
में आप आ सकते हैं। जब आप अहानिकर 
सांपों को संभालना सीखें तो इन चार 
विषधर सांपों से सावधान रहें। इन्हें 
अकेला छोड़ने पर ये एक जैसा व्यवहार 
करेंगे। आइये इनके बारे में संक्षिप्त 
जानकारी प्राप्त करें। 

नाग के बारे में तो हम सभी जानते हैं। 
यह विश्व का प्रसिद्ध सर्प है। जब ये 
उत्तेजित होते हैं और अपनी लंबी गर्दन 
को ऊपर उठा कर फन फैला देते हैं। इसे 


"रक्षा प्रदर्शन कहते हैं। फण फैलाकर 
और इसे आगे लहरा कर सांप अपने शत्रु 
को अपनी भयंकरता से अवगत कराने का 
प्रयत्न करते हैं। 

सांपों में नागों के कई समूह हैं। इनमें से 
भारतीय उपमहाद्वीप में तीन मिलते हैं। 
एकोपाक्ष, चश्मेदार और काला। नागराज 
वास्तव में एक नाग नहीं होता। यह नाग 
से इसलिए संबंधित है कि यह भी अपना 
सिर उठा कर फण फैला देता है। अफ्रीका 
और दक्षिण पूर्वी एशिया में पाये जाने 
वाला विष थकने वाला नाग अपने विष 
दन्तों से इस प्रकार विष उगलता है जैसे 
कोई आदमी पिचकारी से कोई तरल 
पदार्थ छोड़ रहा हो। इसका उद्देश्य अपने 
जहर से शत्रु की आंखों को अन्धा करना 
होता है ताकि यह बचकर भाग निकले। 

भारत में खाल के लिए नाग का व्यापक 
रूप से शिकार किया जाता है जिसकी 
वजह से वह चौकन्ना और कातर हो गया 
है। ये शाम के समय काफी सक्रिय होते हैं 
और धान के खेतों के किनारों पर 
चुहे-चहियों का शिकार करते देखे जाते 
हैं। हालांकि आप नाग को वनों में भी देख 
सकते हैं परन्तु ये ज्यादातर फसल वाले 
खेतों में मिलते हैं जहां इनका प्रिय भोजन 
चूहे प्रचुर मात्रा में मिल जाता है। 

नागिन जून और अगस्त के बीच [0 से 





सामान्य ताग 


30 तक अण्डे देती है। इरूला जनजाति के 
सांप पकड़ने वालों को यह पता है कि 
नागिन अपने आअण्डों को सेने के लिए दो 
महीने तक उनके पास रहती है। हमने 
नाग के अण्डों को बांबियों, चूहे के बिलों, 
भूमि की दरारों, पेड़ के खोखलों और ऐसे 
ही अन्य छायादार स्थानों पर देखा है। 

सामान्य प्रकार का करैत सप आसानी 
से पहचाना जाता है। इसके नील-काले 
शरीर पर आरपार सफेद बन्ध होते हैं 
और इसका सिर छोटा और भोंथरा होता 


है। ये लंबाई में एक मीटर तक बढ़ते हैं 
और चार प्रमुख सांपों में सबसे ज्यादा 
खतरनाक हैं। करैत का विष नाग के विष 
से ॥0 गुना अधिक जहरीला होता है। 
एशिया में भूमि पर पाये जाने वाले सांपों 
में इसका विष सर्वाधिक विषाक्त है। 
करैत रात्रिचर होते हैं। ये रात में 
सक्रिय रहते हैं और दिन में आराम करते 
हैं। ये सारे भारत में पाये जाते हैं।. ये 
आधिकतर बालू मिट्टी में चहे के बिलों में 
आवास बनाते हैं। छपने के लिए इसका 


उ 


हु हे 
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कै 


दुबोइया सांप #$, 


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पु ९, प५ 7 ध्ज हम के 
मु ५ कक. , कं 


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प्रिय स्थान ईंट और मलबे के ढेर हैं 
जिनकी दरारों और कोनों में ये शरण लेते 
हैं। करैत स्वजाति भक्षणकारी होते हैं-ये 
सांपों को खा जाते हैं। ये चहे, पक्षी और 
छिपकलियों को भी खाते हैं। मादा एक 
बार में 0 से 5 अंडे देती है और नागिन 
की ही तरह जब तक अण्डे पक न जाएं 
उनके साथ रहती है। 

दुबोइया सांप मोटा और भारी होता है 
परन्तु खतरे के समय यह आश्चर्यजनक 
गति से भागता है। इस पर जब आक्रमण 


होता है तो यह स्प्रिंग की तरह प्री शक्ति 
से झपटता है। चेन जैसी बनावट और 
सपाट. तीर के आकार के सिर से इसे 
पहचाना जाता है। इसके विष दन्त लम्बे 
और मड़े होते हैं जिनसे यह चूहों और 
अन्य शिकार को आसानी से मार लेते हैं। 

अन्य सांपों की तरह ही दुबोइया भी 
परेशान किये जाने पर ही काटता है। 
परन्तु कभी-कभी तब भी नहीं काटता। 
पिछले वर्ष एक ऐसे ही सर्प से भिड़न्त हुई 
थी जो बाद में एकदम शरीफ बन गया 


दुबोइया के प्रभावी विषदन्त 





था। एक रात रोम ने हमारे कत्तों को 
जोर-जोर से भोंकते सना तो वह यह 
देखने को बाहर निकला कि माजरा क्‍या 
है। वह बरामदे में ही आया था कि अपने 
पैर के नीचे कछ अजनबी वस्तु को देख 
चौंका। उसी क्षण एक जोरदार फंफकार 
से वातावरण गूंज उठा। रोम हवा में 
उछला। उससे कोई आधा मीटर दूर एक 
लम्बा दुबोइया सांप पड़ा था। उसने 
धीरे-धीरे तिरछा चल कर उसकी पीठ 
पर पैर जमा दिया और उसे काटने के 
लिए काफी समय दिया। इस अनुभव ने 
यह सिखाया कि रात में प्रकाश लेकर 
चलना चाहिए। 

इरूला लोगों के साथ सांप पकड़ते हुए 
हमने पाया कि दबोइया खुली झाड़ियों को 
अधिक पसंद करते हैं। कैक्टस की बाड़ 
को विशेषरूप से चाहते हैं। इसलिए जब 
कांटों वाली ऐसी बाड़ (हैज) के पास चलो 
तो अपने कदम सावधानी से रखो। 
दुबोइया अधिकतर चूहे खाते हैं। ये जन्म 
के समय एक साथ 20 से 40 तक पैदा 
होते हैं। ये बहुत संदर और चमकदार रंगों 
के होते हैं तथा अन्य संपों की भांति जन्म 
से ही विष और विष दन्त युक्त रहते हैं। 

चार बड़े सांपों में अफाई सांप सबसे 
छोटा है (दक्षिण भारत में तो यह मात्र 30 
_से.मी. लम्बा होता है)। परन्तु यह छोटा 
34 


शैतान सर्पदंश के विभिन्न मामलों का 
कारण होता है क्योंकि यह आमतौर पर 
हर जगह पाया जाता है। इसके शरीर पर 
भरी और सफेद टेढ़ी-मेढ़ी धारियां होती हैं 
और दबोइया की तरह सिर सपाट होता 
है। ये सांप समतल, खुले क्षेत्र के हैं और 
चट्टानों, गोल पत्थरों अथवा छोटी झाड़ियों 
में छपते हैं। महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले 
में रोम ने स्थानीय सांप पकड़ने वाली 
महार जाति के साथ बरसात के मौसम में 
हजारों ऐसे सर्प गोल पत्थरों के नीचे 
देखे। 

करैत की भांति अफाई भी रात्रिचर है 
पर कभी-कभी नम रात के बाद धृप में 
भी काफी संख्या में देखे जाते हैं। 
बाह्य-उष्मीय होने के कारण (ठंडे रक्त 
वाले) सभी सांप अपने आप को धूप में 
आकर गर्म और छाया में आकर ठंडा कर 
लेते हैं। अफाई सांप चुहिया, छोटी 
चिड़िया, छिपकलियां और आप विश्वास 
करें या न करें बिच्छ को बड़े चाव से खाते 
हैं। जन्म के समय ये मात्र 8 से.मी. के 
होते हैं और एक बार में 4 से 8 तक पैदा 
होते हैं। 

हम भारत वासियों को इन चार बड़े 
खतरनाक सांपों के बारे में जानकारी 
रखना और उन्हें पहचानना बहुत 
महत्वपूर्ण है। गलती होना स्वाभाविक है 





अफाइ साप 


क्योंकि ये एक - दसरे से काफी हैं। 
मिलते-जुलते हैं। पहली बार देखने पर 
नाग ऐसा दिखाई देता है जैसे विषहीन 
धामिन सांय हों। स्मरण रखिये कि 
धामिन का सिर अधिक न॒कीला और 
आंखें बडी होती हैं। जबकि त॒लनात्मक 
रूप में से नाग का सिर गोल होता है। 
करैत को अधिकतर छोटा हानि रहित 
सांखरा सांप समझ लिया जाता है। 
दुबोइया को अजगर और अफाई को 


लम्बा और पतला कैट स्नेक समझ लिया 
जाता है। 

एक बार यदि आप इन चार प्रमख 
सांपों की आदतें और इनके रहने के स्थान 
को जान लें तो इनसे बच कर रह सकते 
हैं। कंटीली झाड़ियों के साथ चलने पर 
पेड़ों की तरफ ही न देखते रहें। अपने 
रास्ते को बार-बार ध्यान से देखें. ऐसा न 
हो कि किसी सर्प पर पैर रख दें और वह 
काट ले। यह भी ध्यान रखें कि सांझ के 


335 


समय बाहर जाएं तो अपने साथ उजाला हों जितना दुबोइया के साथ भिड़न्त में 
भी लें। आप इतने भाग्यशाली शायद न रोम था। 


देशज करैत 





अन्य जहरीले सांप 


ये चार प्रमुख सांप भारत में पाये जाने 
वाले जहरीले सांपों में आम हैं जिन्हें आप 
साधारणतया देख पाते हैं। परन्तु इनके 
अतिरिक्त भी ऐसे सांप हैं जिन्हें अवसर 
मिलने पर देखा जा सकता है। हालांकि 
इनके देखने की संभावना तभी परी हो 
सकती है जब इन्हें ढंढ़ा जाए। सांप एकत्र 
करने वाले कछ निश्चित वनों में खासकर 
हरा गोन्स को पकड़ने अथवा छोटे द्वीपों 
पर समुद्री सांपों को प्रजनन मौसम में अंडे 
देते हुए देखने जाते हैं। चार बड़े जहरीले 
सांपों के अलावा भारत में जहरीले सांपों 
के चार अन्य मख्य सम्‌ह पाये जाते हैं। 


समुद्री सांप 

हम मद्रास के समीप तटवर्ती क्षेत्र में 
रहते हैं जहां हमारे दरवाजे के आगे 
मछआरे अपने जाल खेंचते ले जाते हैं। 
कई बार जब बड़े टोकरे में मछलियां 
निकाली जाती हैं तो उनके साथ-साथ 
समुद्री सर्प भी होते हैं। हमने बहुत बार 
देखा है कि मछआरे उन सांपों को बीच में 
से पकड़ते हैं और वापस सम॒द्र में फेंक देते 
हैं। यह देखकर आश्चर्य होता है कि ये 
मछआरे कितनी आसानी से ऐसे सांपों को 


पकड़ कर फेंक देते हैं जिनके काटने पर 
भारत में कोई विष रोधी सीरम उपलब्ध 
नहीं है। पर सच्चाई यह है कि ये सम॒द्री 
सांप आमतौर पर काटते नहीं हैं और 
इसलिए तैराकों और मछआरों को इनसे 
कोई खतरा नहीं लगता। प्रशान्त 
महासागर में जब हमने एक को पकड़ा तो 
वह शीघ्रता से गोता लगाकर एक मंगे की 
चट्टान की दरार में विल॒प्त हो गया। 

भारत में समद्रतटीय क्षेत्र में रहने वाले 
समुद्री सांपों की लगभग 20 प्रजातियां हैं। 
इनमें सामान्य तौर पर सर्वाधिक पाई जाने 
वाली श॒कनासा और पट्टित समुद्री सांप 
हैं। सभी सम॒द्री सांपों की पूंछ सपाट चप्प्‌ 
जैसी होती है जो उन्हें पानी चीरने में मदद 
करती है। ये मछली खाते हैं और शायद 
यही कारण है कि ये इतने जहरीले होते 
हैं। जब तक कि इसका शिकार संभल 
कर भागने की कोशिश करे सांप को उसे 
पंग्‌ बनाना होता है। 

चुंकि ये समुद्र में रहते हैं इसलिए हम 
इनके बारे में बहुत कम जानते हैं। 
अधिकतर प्रजातियां जीवित बच्चे देते हैं। 
लेकिन एक जलस्थलीय सम॒द्री सांप अपने 
अंडे देने के लिए चट्ठानी द्वीपों के छोरों पर 
आते हैं। न्यगिनी के लायन द्वीप के तट पर 
हमने दोपहर के समय टूटे पत्तों के बीच 
ऐसे बहुत से सर्प देखे। ये वहां ढेरों बिछे 





न ता ५ 
के बह आए जन दे, 


 चप्प्‌ जैसी पंछ वाले समद्री सांप 


रहते हैं। हममें से एक का पैर जब इन पर 
पड़ गया था तो उसने काटने का प्रयास 
तक नहीं किया। 

सम॒द्री सांप अपनी सांस रोक कर पांच 
घंटे तक जल के अन्दर रह सकता है। यह 
00 मीटर गहराई तक गोता लगा लेता 
है। अन्य समद्री रेंगने वाले जीवों जैसे 
समुद्री कछए और खारे पानी के 
मगरमच्छ की भांति इन सांपों में भी ऐसी 
ग्रंथियां होती हैं जिनके द्वारा ये अतिरिक्त 
नमक छोड़ते रहते हैं। 


पिट वाइपर (गर्त्त पदाक) 

इन्हें पिट वाइपर (गर्त्त पदाक) इसलिए 
कहा जाता है क्‍योंकि इनकी आंख और 
नथुनों के बीच हल्के गड्ढे होते हैं। इनसे 
गर्मी का पता लगता है। ये इतने 
36 


संवेदनशील होते हैं कि अपने पास किसी 
गर्म रक्त के जीव के आते ही तापमान में 
होने वाले परिवर्तन को भाप लेते हैं। यदि 
आप इन्हें अन्धा भी कर दें तो भी ये अपने 
शिकार का अंदाजा लगा कर उसे मार 
लेंगे। भारत के चाय और कॉफी बागानों 
में पिट वाइपंर सामान्य तौर पर मिलते 
हैं। इन्हें इस क्षेत्र की जलवायु बहुत 
उपयुक्त लगती है। इनकी लगभग ॥]5 
प्रजातियां हैं और इनके द्वारा काटे जाने की 
घटनाएं पर्याप्त होती हैं। परन्तु इनका 
विष बहुत शक्तिशाली नहीं होता और 
मृत्यु होने के मामले बहुत कम होते हैं। 
सर्वाधिक सामान्य प्रजातियों के अन्तर्गत 
मालाबार और कबटनासा गर्त्त पृदाक 
आते हैं। 

गर्त्त पृदाक वनों में पाये जाने वाले सांप 
हैं। इनका जीवन रहस्यपूर्ण है। मेंढ़क, 
छिपकलियां और छोटी चिड़िया इनका 
मुख्य आहार है। इनके छोटे बच्चे मेंढ़कों 
और छिपकलियों को आकर्षित करने के 
लिए एक चाल चलते हैं। वे अपनी रंगीन 
पंछ को लहरा कर उन्हें प्रलोभन देते हैं। 
जैसे ही दूसरे जीवन इनकी ओर आकर्षित 
होते हैं, वे पकड़े जाते हैं। कछ गर्त्त पृदाक 
वृक्षों पर भी रहते हैं। जबकि दूसरे नम, 
ठंडी धाराओं के किनारों या भूमि पर 
झाड़ियों में रहते हैं। 





मालाबार गर्त पदाक (पिट वाइपर!। 


नागराज 
विश्व के सर्वाधिक लम्बे विषयुक्त 
सांप नागराज की कहानी अन्य किसी भी 
सांप से रोचक है। केवल ये ही सांप ऐसे हैं 
जो घोंसले बनाकर जोड़े में रहते हैं। 
रोम ने दक्षिण भारत के जंगलों में ऐसे 
कुछ सांप पकड़े और इनकी मादाओं को 


अंदमान द्वीपों के वाष्पपूर्ण घने जंगलों में 
घोंसलों में देखा। उसने देखा कि नागराज 
के बारे में लोगों का यह कहना सत्य नहीं 
है कि वह लोगों पर आक्रमण करता है। वे 
शरीफ, बहुत बुद्धिमान सांप हैं और 
अवसर प्राप्त होते ही आदमी की आंखों से 
दूर हो जाते हैं। 

भारत में नागराज अधिकतर पश्चिमी 
घाट, उत्तर-पूर्व के उहाड़ी जंगलों और 
हिमालय की तराई में जो ठंडे और पेड़ 
पौधे वाले क्षेत्र हैं, पाये जाते हैं। दिलचस्प 
बात यह है कि ये उत्तर-पर्वी तटवर्ती क्षेत्रों 
और अंदमान द्वीपों के वाष्पयक्त घने 
जंगलों में भी देखे जाते हैं। ये प्रायः चाय 
और कॉफी के मैदानों में देखे जाते हैं, जहां 
इन्हें मार दिया जाता है और इस प्रकार 
इनका काफी वंश नष्ट हो जाता है। 
घोंसला बनाते समय मादा पत्तों को एकत्र 
कर एक टीला सा बनाती है और उसमें 
20 से 30 अंडे देती हैं। अंदमान में एक 
घोसला 30 से.मी. ऊंचा था। वह अपने 
घोंसले में या उसके आसपास अंडे देने के 
60 दिन तक रहती है जब तक कि अंडे 
पक न जायें। नागराज स्वजाति भक्षी 
होता है और अन्य सांपों को खा जाता है। 
छोटे बच्चे नौतलपीठ और पनिहा सांप 
तथा वयस्क धामिन सांप को अपना 
आहार बनाते हैं। 


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चूंकि नागराज घने जंगलों में मिलते हैं 
इसलिए इनके काटने पर मौत के मामले 
कम सामने आते हैं और इनका कोई 
विवरण उपलब्ध नहीं है। नागराज के 
काटने पर बचने वालों में बिलहास्ट का 
नाम उल्लेखनीय है। 


मूंगिया सांप (कोरल स्नेक) 
विष वाला मूंगिया सांप चमकीले रंग 
का और पतली चमड़ी का होता है। भारत 


में इसकी 5 प्रजातियां मिलती हैं। सबसे 
लम्बा धारीदार मूंगिया सांप लगभग एक 
मीटर तक लम्बा होता है और खतरनाक 
हो सकता है। फिर भी, भारत में मंगिया 
सांप के काटने पर हुई मौतों का कोई 
विवरण उपलब्ध नहीं है। अमेरिका में 
बच्चे कभी-कभी भ्रमवश इसे सिंद्री सर्प 
या अन्य प्रजाति समझ कर उठा लेते हैं, 
पर सौभाग्यवश यह बह॒त कम काटता है। 

मृंगिया सांप विभिन्न परिस्थितियों में 
रहता है-झाड़ीदार जंगलों से लेकर ऊंचे 


मुंगिया (कोराल) सांप 





हिमालय तक। ये रात्रि के समय सक्रिय 
रहते हैं और दिन में पत्तों, धासफस अथवा 
लकड़ियों में सोते हैं। ये अंडे देते हैं। अन्य 
छोटे सांपों की तरह ये भी शत्रु से बचने 


के लिए चालाकी पूर्ण तरीके अपनाते हैं। 
उदाहरण के लिए सिर पर से ध्यान हटाने 
के लिए ये अपनी रंगीन पंछ को हिलाते 


हैं। 


4] 


सर्पदंश 


पुराने जमाने में, जब भारत में विष-रोधी 
दवाएं नहीं बनी थीं, सांपों से भयभीत होने 
की अच्छी वजह थी। सांप के काटे का 
कोई इलाज नहीं था और उसके काटने से 
मृत्य तक हो जात्ती थी। फिर भी, बीसवीं 
शताब्दी के प्रारंभ में हाफकिन्स संस्थान, 
बंबई में विष रोधी सीरम का निर्माण कर 
लिया गया था। यह आश्चर्यजनक औषधि 
थी जिससे प्रति वर्ष हजारों जान बचीं। 
विषरोधी दवा का निर्माण घोड़ों के अन्दर 
सांप के विष की हल्की सी मात्रा प्रविष्ट 
करा कर किया जाता है। बाद में उनके 
रक्‍त से जीवनरक्षक विषरोधी दवा बनाई 
जाती है। असाधारण बात इसकी तीव्रता 
है जिसके अनुसार यह काम करती है। 
हमने एक ऐसा आदमी देखा जो नाग के 
काटे जाने पर पूर्णतः शिथिल हो गया 
इतना कि वह सहायता के लिए जा भी न 
सका। परन्तु विषरोधी सीरम देते ही आधे 
घंटे के समय में ही वह उठ कर बैठ गया 
और चाय पीने लगा। 

सांप का विष एक तरह की अत्यन्त 
विकसित लार है जिसे वह अपने शिकार 
को मारने और पचाने दोनों ही कामों मे 
प्रयकत करता है। पर विष आदमी के 


विरुद्ध नहीं बना है क्‍योंकि सांप हमसे 
बहूत समय पहले से ही धरती पर जन्म ले 
चुंके थे। 

सर्प विष दो प्रकार का होता है। एक 
स्‍नाय पर प्रभाव डालता है (करैत और 
नाग का विष) और दूसरा रक्‍त पर (जैसा 
पृदाक का होता है) विष-रोधी 
बहु-संयोजन चारों प्रमुख सांपों के काटने 
पर बड़ा अच्छा काम करते हैं। 

यदि किसी व्यक्ति को जहरीला सांप 
काट ले तो उसे दो बातों का ध्यान रखना 
चाहिए। अस्पताल जाये और विष रोधी 
सीरम ले, कीमती समय को दादी मां की 
दवाओं, मंत्रों और जड़ी-बूटियों के इलाज 
में बर्बाद न करे। 

यदि आप को सांप काट ले तो शान्त 


झाड-फक करने वाले के पास न जाएं 





रहें। जब कोई आदमी भयभीत या 
चिन्ताकल हो जाता है तो उसका रक्त 
तीब्र गति से प्रवाहित होता है और जहर 
भी शीघ्र फैलता है। इसके बाद कपड़े की 
एक पट्टी या बंध, काटे हुए स्थान पर बांध 
देना चाहिए। यदि हाथ पर काटा हो तो 
भूजा पर बांधना चाहिए। यदि सांप ने 
पिंडली या पैर में काटा हो तो जांघ के 
ऊपर बांघे। बहुत कस कर नहीं बांधना 
चाहिए। इतना ढीला रखें की उसमें 
अंगुली घ्स जाए। 


अधिकतर लोगों को “शष्क दंश'' लगता है 


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सभी जहरीले सांपों के काटने पर मृत्यु 
नहीं होती। बहुत कम ही घातक सिद्ध 
होते हैं। जिस प्रकार प्रत्येक मच्छर के 
काटने पर मलेरिया नहीं होता उसी तरह 
प्रत्येक सांप के काटने पर जहर नहीं 
फैलता। बह॒त से सांप, जैसा कि लोग 
जानते हैं “शुष्क दंश” मारते हैं यानी 
काटने पर जहर नहीं छोड़ते। परन्तु कछ 
सांपों का जहरं॑ तत्काल प्रभाव नहीं 
दिखाता (जैसे करैत का) इसलिए सांप के 
काटने पर अस्पताल जाना आवश्यक है। 


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वक्षीय सांप 
वक्षीय सांप पतले, लम्बे और चपल होते 
हैं। इनकी आंखों की रोशनी तेज होती है 
जिससे ये छिपकलियों, मेंढ़कों और वक्ष 
की शाखाओं और झाड़ियों पर बैठी 
चिड़ियों का शिकार करने में आसानी 
अनुभव करते हैं। चूंकि वृक्षीय सांपों को 
अपना शिकार दिन के उजाले में 
लुक-छिपकर करना होता है इसलिए 
अच्छी दृष्टि और गति पर ही ये निर्भर 
होते हैं। 

भारत में इनके तीन वर्ग मिलते हैं : 
कांस्यपृष्ठ, हरा सांप और बिलला सांप। 
सामान्य कांस्यपष्ठ, पूरे भारत में मिलता 
है और आमतौर पर बागानों तथा ताड़ के 
पत्तों की ओट में छाया और आश्रय के कांस्यपष्ठ वृक्षीय सांप 
लिए छपा रहता है। माली इस सांप को ह 
अक्सर बागानों में फलों की क्यारियों 
अथवा गमलों में लगे पणांगों मे से गुजरते जिन्हें कोंतरी भी कहते हैं शामिल है। 
हुए देखते हैं। इसका रंग सुंदर गहरा भूरा हमने अपनी खिड़की के बाहर एक 
है तथा पीठ पर कांस्य रंग की पट्टी है। कांस्यपृष्ठ सांप देखा जिसने पूंछ झाड़ती 
देखने में चाकलेट जैसा रंग का दिखता है। हुई एक कोतरी को पकड़ रखा था। (क्या 
इसके आहार में चमकदार छिपकली आपने कभी छिपकली को ऐसा करते देखा 





है) सांप ने पहले पंछ निगली फिर उसे 
मिट्टी में दबोचा और फिर सारी कोतरी को 
खा गया। कांस्यपृष्ट (ब्रांज बैक) सांप 
पतला होता है और पूरा खिलाड़ी होता है। 
अपने शिकार का पीछा करते हुए यह एक 
शाखा से दसरी पर उछलता-कदता 
फिरता है। मादा लगभग छह छोटे अंडे 
किसी छेद या दरार में देती है। दक्षिण 
भारत में इनके जन्म का समय जून का 
आरंभिक काल होता है जिससे प्रथम 
बरसात के बाद पैदा होने वाले मेंढक और 
अन्य जीव इनका आहार बन जाते हैं। 

वक्षीय सांपों का दूसरा वर्ग हरा (वाइन 
स्नेक) सांप हैं। सांपों में ये कार्टन होते हैं। 
इनका सिर लम्बा और न्‌कीला तथा आंखें 
अजीब-सी होती हैं। इनका चमकीला हरा 
रंग और न॒कीला सिर इनकी पहचान में 
मददगार होती हैं। ये सारे भारत में पाये 
जाते हैं। जब ये आनंदित होते हैं तो जोर 


से सांस लेते हैं और वायु से शरीर को भर 
लेते हैं। इससे इनके शरीर पर परतों के 
बीच काली और सफेद धारियां उभर 
आती हैं। इन धारियों और चौखानों तथा 
गलाबी मंह से यह काफी प्रभावी लगता 
है। हरा सांपों के एक बार में लगभग आठ 
बच्चे होते हैं जिनकी नाक चपटी होती है। 
ये अपने माता पिता की प्रतिकृति होते हैं। 
कई पहाड़ी किसमें भी पायी जाती हैं जो 
भरी या नारंगी रंग की होती हैं। इनका 
सिर कम नुकीला होता है। 

बिल्ला सांपों (कैट स्नेक) का नामकरण 
इनकी बड़ी आंखों और रात्रिचर ज़ैसी 
आदतों के कारण हुआ है। ये पतले और 
लंबे होते हैं तथा अपनी जीभ से भोजन 
(गिरगिट, छिपकली, चुहिया, छोटी 
चिड़ियां आदि) संघने का काम लेते हैं। ये 
6 से 8 तक अंडे देते हैं। इनके विषदन्त 
आगे होते हैं जिसका तात्पर्य हुआ कि मुंह 


हरे सांप का पत्ता नमा सिर 





के अन्दर लम्बे दांत भी होते हैं। फोरसटेन 
बिलला सांप के काटने पर काफी दर्द होता 
है। प्रमख ।| नस्‍्लें पहाड़ी होती हैं परन्त 
सामान्य बिल्ला सांप मैदानों में भी मिलता 
है। इसे आमतौर पर जहरीला फरसा सांप 
समझ लिया जाता है। ये दोनों प्रकार के 
सांप अक्सर झोंपड़ियों में ताड़ के पत्तों की 
छतों में छिपे रहते हैं। 

वक्षीय सर्पों में सबसे अधिक 
आश्चर्यजनक उड़ने वाला सांप है। यह 
अविश्वसनीय लगता है कि यह सांप वृक्ष 


पर से 30 मीटर नीचे जमीन पर बहती 
हवा में उड़ता हआ आ जाता है। यह 
अपने शरीर को लहराकर और कागज के 
राकेट की तरह बहा कर उड़ता है। हमने 
ऐसे उड़ने वाले सांपों को अपने बाड़ों में 
पाला है और उन्हें छिपकलियां, चूहे और 
मेंढक आदि खाने को दिए हैं। इनका रंग 
आकर्षक होता है। काला रंग, पीले और 
सफेद निशान तथा लाल छोींटे। उड़ने 
वाले सांप एक बार में लगभग 6 से ॥0 
तक अंडे देते हैं। 


बिलला सांप (केट स्नेक) 








पानी वाले सर्प के काटने पर कई बार दर्द होता है पर यह अहानिकर है। 


पनिहा सांप 

जैसा कि नाम से पता चलता है ये सांप 
अपना अधिकतर समय पानी में बिताते 
हैं। ये मेंढक और मछली खाते हैं। भारत 
में पाये जाने वाले ताजे पानी के सांपों में 
कोई भी जहरीला नहीं है, परन्‍्त यदि आप 
इन्हें उठायें तो इनके तेज दांतों से 
सावधान रहें। खारे पानी के सांप थोड़े 
जहरीले होते हैं ताकि अपने शिकार को 
अच्छी तरह पकड़ सकें। परनन्‍त यह जहर 
आदमी पर असर नहीं करता। 


पनिहा औसत आकार का सांप होता 
है। न बहत पतला, न बहत मोटा। वक्षीय 
सांपों की तरह ये सरपट नहीं दौड़ते और 
अपना समय इधर-उधर घमकर ही बिता 
देते हैं। जब ये पानी में होते हैं तो दह और 
तेज तैराक होते हैं। 

भारत में पाये जाने वाले लगभग 20 से 
अधिक पनिहा सांपों की पीठ उभरी होती 
है यानी प्रत्येक तह में एक छोटी झर्री सी 
होती है। ताजे पानी में पाये जाने वाले 
आमतौर पर सर्वाधिक सांप चिन्हित 


नौतल पीठ वाले या जैतूनी नौतल पीठ 
वाले हैं। दोनों प्रकार के सांप भारत में हर 
जगह मिलते हैं पर मैदानों और निचले 
पहाड़ी इलाकों में अधिक मिलते हैं। 
चिन्हित नौतल पीठ वालों का रंग काले से 
पीले तक विभिन्न प्रकार का होता है तथा 
काली और सफेद बनावट होती है। आंखों 
पर काली धारियां होती हैं और सिर लम्बा 
होता है। यह रात और दिन दोनों समय 
सक्रिय रहता है। हमने देखा है कि 


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आतंकित होने पर ये नाग की तरह फण 
फैला कर लहराते हैं। नया-नया पकड़ा 
गया चिन्ह्ति नौतल पीठ वाला सांप 
वास्तव में काटता है। मादा एक बार में 
20 से 40 तक अंडे किसी छिद्र या नाली में 
देती है तथा जब तक वे प्रस्फटित न हो 
जाएं, उन्हीं के पास रहती है। 

इसकी अपेक्षा जैतूनी नौतल पीठ वाला 
सांप पतला होता है और इसका शरीर 
गहरा हरा होता है। यह ठंडे दिमाग का 


चकते वाला उभरी पीठ का सांप अपने अंडों के साथ 


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होता है तथा काटता नहीं हे (बशतें आप 
मेंढक या मछली न हों)। इसके बारे में 
सबसे दिलचस्प बात जो हम जानते हैं वह 
यह है कि यह मच्छर के लार्वा को खाता 
है। यह एक ऐसी मित्रतापर्ण सेवा है जिसे 
यह हमारे लिए मुफ्त करता है। 

जल में रहने वाला अन्य दसरा पनिहा 
है कत्ते जैसी शक्ल वाला सांप (पानी का 
सांप)। यह आमतौर पर नदी के महानों 
की दंरारों, नमक की क्यारियों. सम॒द्र के 


एस के खारे पानी के तालाबों और नदियों 
में पाया जाता है। इसका रंग धूसर होता 
है और पीछ पर काले निशान रहते हैं। 
अत्यक आंख के पीछे दो पढ़ियां होती हैं। 
यह रूखा और मन्‍्द सांप है। भारत के 
जलसभरों में पाई जाने वाली 'अग्न विष 
दन्‍त वाली छह किस्मों में से यह 
एक हैं। 

हमारे घर के पास एक स्थान पर जहां 
हम रात्रि में कभी-कभी मछली पकड़ने 











कत्ते जैसी शक्ल का जल सर्प 


जाते हैं। क॒त्ते जैसी शक्ल वाले" सांप 
की विशेष नस्ल देखने को मिली। यह 
स्थान खारे पानी की ज्वारीय दरार थी। 
रात्रि में फ्लशलाइट के प्रकाश में देखने से 
ऐसा लगा जैसे कीचड़ में जान हो और 
उसमें धूसर शरीर हो। हमने इन सांपों 
को मछली पकड़ कर निगलते और हल्की 
चांदनी में नांचते देखा। यह सांप भूमि पर 
लोटता है। शीघ्रता से क्षणों में यह एक 
तरफ. लोट कर कदता है। खारे पानी के 
सभी सांप लगभग ]0 से 30 तक बच्चों 
को जन्म देते हैं। 


बरसात के मौसम में जब आपके दोस्त 
यह कहें कि उन्होंने सड़क पर जाते हुए 
काफी सांप देखे हैं, तो समझ लीजिए कि 
वे पनिहा सांप हैं। जब हमें लोगों ने अपने 
घर में सांप पकड़ने बुलाया तो अधिकतर 
वे पनिहा थे। और जब कई बार लोगों ने 
जहरीला सांप मारने का दावा किया तो 
पाया गया कि वे हानि रहित पनिहा सांप 
थे। पनिहा सांप, सर्प-चर्म उद्योग के लिए 
लाखों की संख्या में मारे जाते हैं क्योंकि 
नाग और अन्य बड़े सांपों को पकड़ना 
कठिन हो रहा है। 


बांबी सांप 

बांबी सांप भूमि के अन्दर रहते हैं। 
वास्तव में कछ अन्य सांप भी हैं जो गर्मी 
और परभक्षियों से बचने के लिए भूमि के 
अन्दर बिलों में रहते हैं। बांबी सांप वे हैं 
जो स्वयं अपने बिल बनाते हैं अन्य सांप, 
चूहों, दीमक, केकड़ों द्वारा बनाये गये 
बिलों को हथिया कर उनमें जा बसते हैं। 
बांबी सांप का सिर सखब्बल की भांति 
शक्तिशाली होता है। अपने मजबत 
शरीर और गरदन से यह नरम भमि में 
बिल बना लेता है। इसकी पहाड़ी 
प्रजातियां गर्मी के प्रति इतनी संवेदनशील 
होती हैं कि प्राय: जब आदमी इन्हें हाथ में 
लेता है तो उसके तापक्रम (37 डिग्री सें.) 
के स्पर्श से ही यह मर जाते हैं। 

भारत में बांबी सांप की तीन नल्ले हैं : 
छोटा कृमि सांप (प्रायः इसे कृमि समझ 
लिया जाता है), कवच पंंछ अथवा 
यूरोपीडियस और दोमुहा। 


कृमि सांप 

कृमि सांपों की [4 प्रजातियां हैं जो 
सभी टायफ्लीना वंश से संबंधित हैं। 
अक्सर इन्हें कृमि समझ लिया जाता है 
जब तक आप इसकी छोटी आंखें और 
चमकदार सलवटें न देख लें। भारत में 
इसकी आमतौर पर पाई जाने वाली 


प्रजाति लाल-भूरी होती है जो हर जगह 
मिलती है। वैज्ञानिक यह जानकर 
आश्चर्य चकित हो गये कि इस वंश में 
नर नहीं होते। कुमि सांप ' अनिषेक-जनन 
होते हैं यानी मादा बिना नर की सहायता 
से 5 से 8 तक अंडे देती है। 

कृमि सांप नम, आर्द्र भूमि या पत्तों के 
नीचे पाये जाते हैं। ये कीड़े-मकोड़े आदि 
को आहार बनाते हैं जो भूमि के नीचे रहते 
हैं। जब इन्हें हिलाया-डलाया जाए तो 
अन्य बांबी सांपों की तरह ये अपनी रक्षा 
में पूंछ मारते हैं। आदमी यह समझता है 
कि उसे डंक मारा जा रहा है। ऐसी 
तरकीब और चालाकी अन्य सांप नहीं 
दिखाते। 


कवच पूंछ वाले 

दक्षिण भारत की पहाड़ियों में सांपों की 
खोजबीन करते हुए हमारे सामने प्रायः ये 
छोटे गोल-मटोल सांप आ जाते हैं। इनकी 
सलवटें नरम और चिकनी होती हैं। यह 
दिलचस्प बात है कि कबच पंछ वाले 
सांपों का पेट बहत रंगीन होता है। जबकी 
पीठ फीके रंग की होती है। इस संयोग से 
ये अपने शत्रुओं को चकमा देने में सफल 
हो जाते हैं। पीठ प्रभावी छदमावरण का 
काम करती है जबकि रंगीन पेट को सांप 
खाने वाले बे-स्वाद समझते हैं। कवच पंछ 


5] 





मा आम 


री प्जकल 


कृमि सांप-शायद ये संसार में हर जगह पाये जाने वाले सांप हैं। 


सांपों के शरीर पर एक विशेष चमकदार 
बहु॒वर्ण छटा होती है जो इस पर गंदगी या 
कीचड़ से बचाती है। दक्षिण और मध्य 
भारत की पहाड़ियों में इन विलक्षण सांपों 
की लगभग 40 प्रजातियां हैं। ये केंचुए 
और लार्वा खाते हैं। मादाएं एक बार में 
अक्सर 3 से 5 तक बच्चे देती हैं। 
इनकी प्रत्येक पहाड़ी श्रृंखला में कम से 
कम एक ऐसी प्रजाति मिलती है जो अन्य 
से बिल्कल अलग होती है। इस प्रकार यह 
नस्ल जीवों पर अध्ययन करने वाले 


वैज्ञानिकों के लिए बहुत दिलचस्प है। 
प्रत्येक समृह के अपने विश्शष्ट 
घातावरणीय लक्षण होते हैं। जिस तरह 
अफ्रीका में जिराफ की गर्दन लम्बी होने से 
बह ऐसे पत्तों का भोजन करता है जिन्हें 

अन्य पश्‌ नहीं खाते, उसी प्रकार 
कवचपुृंछ वाले सांप शत्रु से बचने और 
आहार में सहायता के लिए अपने में 
विशिष्ट विशेषताएं उत्पन्न कर लेते हैं। 

कवचपंछ वाले सांप बनों में रहते हैं। 
बहत से क्षेत्रों में वनों की अन्धाधन्ध 


कटाई के कारण इनकी संख्या बहत दोम॒हा 

सीमित होती जा रही है। जब बड़ी संख्या दोमुहा दक्षिण अमेरिका के संकीर्णक 
में वृक्षों की कटाई होती है तो वहां भूम के अजगर से संबंधित है। ये अजगर से भी 
नीचे की आर्द्रता समाप्त या कम हो जाती काफी निकट हैं। ये सभी विषहीन सांप 
है और वहां गर्मी हो जाती है जिससे काफी शिकार को अपनी मांसल कंडली में फंसा 
छोटे जीव और वनस्पतियां समाप्त हो कर मारते हैं। भारत में दोम॒हा की दो 
जाती हैं जो केवल ठंडी छायादार स्थिति में किसमें पाई जाती हैं। दोनों सद॒ढ़ और 


ही रह सकती है! भारी शरीर वाले सांप हैं जो भूमिगत 


कवच पूछ जाला साथ (शील्ड टेल) 





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गतिविधियों के उपयुक्त हैं। दोम॒हा के 
शरीर पर बिन्दुओं की धब्बेदार आकृति 
और लहरदार बन्द पडे होते हैं। शरीर 
रूक्ष, उभरा हुआ और निढ़ाल सा होता है 
जबकि लाल दोमुहा इससे काफी भिन्न है। 
यह लाल भूरा, मुलायम व चिकना होता 
है। फिर भी, दोनों की पंछ में भारी अन्तर 
होता है। लाल दोमुहा (जो उत्तर-पश्चिम 
भारत में काले रंग का होता है) की पंछ 
इतनी भोंथरी होती है कि लगता है किसी 
ने काट दी हो। स्वभाव में भी दोनों नहीं 
मिलते हैं। सामान्य दोमहा शीघ्र गस्से में 
आकर काटने को दौड़ता है जबकि लाल 
दोम॒हा में बहुत सहनशीलता होती है और 
वह शायद ही काटता हो। बच्चों को 
परिचय कराने के लिए यह आदर्श सांप 
है। बालुई अजगर कन्तकों (चुहों आदि) 
को खाते हैं और इस तरह किसानों के मित्र 
हैं। हमने एक छोटे नवजात दोम॒हा को 
एक चुहिया का शिकार इस प्रकार करते 
देखा जिस प्रकार कोई बड़ा अजगर अपने 
आहार के लिए जंगली सूअर का आखेट 
कर रहा हो। दोम॒हा एक बार में 6 से 8 
तक बच्चे देते हैं। नव जात सांप छोटे 
चहों, छिपकलियों, चिड़ियों और 
कीड़े-मकोड़ों का भक्षण करते हैं। हाल ही 
में हमारे बेटे ने चिड़ियों को आतंकित 
होकर चीखते हुए देखा तो पाया कि 


-. 34 


दोम॒हा ने एक चिड़िया को दबोच रखा है। 


भू सर्प 

भारत के मैदानी क्षेत्र में विभिन्न प्रकार 
के भूमि वाले सांप मिलत्ते हैं। इनमें से 
धामिन भी अजगर की तरह एक सांप है। 
अन्य सांपों में हैं दुमछलला, शाही सांप 
आदि पर ये प्रायः हमें दिखाई नहीं दिये। 
भू सर्पों में अन्य व्यापक रूप में पाये जाने 
वाले सांप हैं ककरी, कावड़ी सर्प और 
दौड़ाक (रेसर) आदि। 


धामिन 

धामिन लंबे, तेज गति वाले सांप हैं जो 
202 मीटर तक लंबे होते हैं। इनका 
आकार और रंग नाग की तरह का होता 
है। धामिन वहां मिलते हैं जहां चहे 
अधिक होते हैं। इसलिए ये चावल के 
खेतों में प्रायः ही मिलते हैं। जैसे-जैसे 
पहाड़ी क्षेत्रों को साफ करके खेती योग्य 
बनाया जा रहा है धामिन सांप ऊपर की 
ओर बढ़ते जा रहे हैं। हमने अभी 3,000 
मीटर ऊंचे मैदानों में भी धामिन को 
देखा। पहले ये ,000 मीटर से अधिक 
ऊंचे स्थानों पर शायद ही दिखाई देते थे। 

धामिन दिन के समय सक्रिय रहते हैं 
तथा कन्तकों, मेंढ़कों और पक्षियों का 
शिकार खेतों और झाड़ियों में करते हैं। 


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बड़े धामिन शीघ्र ही कष्ट पर्ण दंश देकर 
अपने बचाव में भाग खड़े होते हैं। हमने 
नागराज की तरह इन्हें भी पहली बार 
पकड़े जाने पर गले से गराते देखा है। 
इनका रंग स्याह काले से लेकर पीला-सा 
या भूरा भी होता है। मादा एक बार में & 
से ]6 अंडे देती है। अडों से बाहर 
निकलने पर सांप के बच्चे मेंद्रक आदि 
खाना प्रारंभ कर देते हैं। प्रजनन के मौसम 
में नर धामिन एक तरह का लड़ाक नृत्य 





करने लगते हैं। यह वास्तव में अपने क्षेत्र 
को दूसरे नर धामिनों से सरक्षित रखने के 
लिए किया जाता है ताकि वे उधर न आयें। 

इस लड़ाक कश्ती में बहत से सांप 
इकट्ठे हो जाते हैं। पर यह नत्य सिर्फ नर 
धामिनों के बीच होता है और उनमें से 
कोई भी चोट ग्रस्त नहीं होता। बहत से 
लोग कहते हैं कि यह सहवास की क्रिया 
हैं, पर यह गलत है।. धामिन सांप भारत 
में आमतौर पर दिखाई पड़ते हैं, इसलिए 


इनके बारे में बहुत सी कहानियां, 
किवदंतियां आदि प्रचलित हैं। 


अजगर 

विश्व में पाये जाने वाले सबसे लंबे 
सांप अजगर हैं। ये 8 या 9 मीटर तक लंबे 
होते हैं और अपनी मांसल शक्ति से पूरी 
आयु के तेंदुए तक को दबोच कर निगल 
जाते हैं। भारत में इनकी जो दो प्रजातियां 
पाई जाती हैं उनमें एक है चट्टानी अजगर 
(रॉक पायथन)। यह झाड़-झंखाड़ वाले 
वनों अथवा घने जंगलों में सारे देश में 
मिलते हैं। दसरा है राजसी अजगर 
(रीगल पायथन), यह उत्तर-पूर्वी भारत 
तथा निकोबार द्वीपों में मिलता है। 
हालांकि सर्प चर्म उद्योग वालों ने इनकी 
नस्ल को चौपट कर दिया है तो भी 
संभावना है कि आप को चट्टानी अजगर 
कहीं देखने को मिल जाए। 

चट्टानी अजगर 6 मीटर तक लम्बा 
होता है। इसका शरीर भारी और 
मुलायम होता है तथा इस पर दोम॒हा की 
तरह भूरे से छापे होते हैं। एक दिलचस्प 
तथ्य जो इनके बारे में है वह यह कि इनके 
स्पर (कंट) होते हैं। जैसा कि आप जानते 
हैं सांपों का विकास छिपकली जैसे रेंगने 
वाले जीवों के साथ पैरों सहित हआ। 
परन्त सिर्फ अजगर और दोमहा ही ऐसे 


356 


सांप हैं जिनके पैर पूरी तरह विल॒प्त नहीं 
हुए हैं। ये ठंडी जगहों, अंधेरी गफाओं, 
पेड़ के ठुंठों और खोखलों में रहते हैं। रात 
के समय ये छोटे स्तनपायी और अन्य 
शिकार की खोज में निकलते हैं। ये बिना 
खाये कई-कई दिन गुजार देते हैं परन्त 
पानी इनके लिए जरूरी होता है। चिड़िया 
घर में एक नमूने ने दो साल तक कछ नहीं 
खाया। 

मादा चट्टानी अजगर मार्च और जून के 
बीच में लगभग ]00 अंडे देती है तथा 
उनके पास लगभग 80 दिन तक रहती है 
जब तक कि उनमें से बच्चे नहीं निकल 
आते। सर्प विज्ञानी यह सोचते थे कि मादा 
अपने अंडों के पास इसलिए रहती है ताकि 
उनकी परभक्षियों जैसे घंस, जंगली सूअर 
आदि से रक्षा कर सके पर अब हम जानते 
हैं कि मादा अजगर अपने अंडों को फफंद 
से बचाती है उन्हें सही अंधेरे में बनाये 
रखती है तथा चींटियों से उन्हें बचाती है। 
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अंडों 
को वह तापमान प्रदान करती है जिसकी 
पकने के लिए उन्हें आवश्यकता होती है। 
वह अपनी मांसपेशियों को ऐंठन देकर 
शरीर का तापमान बढ़ा लेती है। जितना 
तेज वह ऐंठती है उतनी ही वह गर्म होती 
जाती है और अंडों को गर्म करती है। 
सांपों के बारे में इस प्रकार की निरंतर 





अजगर अपने अंडों के साथ १ 





खोज जारी है क्‍योंकि प्रकृति के इन बारे में खोज करना न केवल दिलचस्प ही 
लुभावने जीवों के बारे में काफी कछ है बल्कि इस क्षेत्र में नयी खोज करने के 
जानना अभी बाकी है। इस प्रकार सांपों के लिए भी पर्याप्त अवसर हैं। 


60 





अजगर के बच्चे का प्रस्फरण 


पालत्‌ सांप 


अहानिकर सांपों की बहुत सी प्रजातियों 


को आराम से बाड़ों में पालकर पालतू 


बनाया जा सकता है। अमेरिका में बहुत 
से किशोर बच्चे संशोधित जलजीवशाला 
बना कर रखते हैं जिन्हें स्थलजालय 
(टेरेरियम) कहा जाता है। भारत में 
दुमछल्ला सांप, दोम॒ुहा, धारीदार नौतल 
पीठ वाले और चकत्तेदार नौतल पीठ वाले 
सांप को आसानी से पाला और खिलाया 
जा सकता है। दमछलला और दोमहा को 
चहे तथा नौतल पीठ के दोनों सांपों को 
मेंढक और मछली खिलाई जा सकती है। 

एक सामान्य मछली शाला को जिस 
प्रकार पर्याप्त वायु संचरण वाले स्थान की 
आवश्यकता होती है उसी प्रकार घरेलू 
सर्प शाला के लिए भी यह आवश्यक है। 


62 


जब तक स्थलजालय को स्वच्छ रखा 
जाएगा, पीने का साफ पानी रखा जाएगा 
तथा कम से कम सप्ताह में एक बार भर 
पेट भोजन दिया जाता रहेगा तब तक वह 
फलता-फलता रहेगा। नये पकड़े गये सांप 
के साथ सावधानी से तथा मृद॒ता से 
व्यवहार करना चाहिए अन्यथा वह 
भयभीत होकर रक्षात्मक हो जाता है। मद 
व्यवहार तथा धैर्य से उसके डर को दूर 
करने पर संभव है सांप पालत्‌ बन जाए। 
पर ऐसी आशा न रखें कि वे आपके 
सामने दम हिलाएंगे अथवा बलाने पर 
दौड़े आएंगे। 

चंंकि सांपों को उन परिस्थितियों में 
रखना मुश्किल है जैसी वे चाहते हैं 
इसलिए इनमें से कछ बाड़ों में ठीक नहीं 
रह पाते। कछ खाना-पीना छोड़ देते हैं 
और कुछ हर समय भागने का प्रयत्न 
करते रहते हैं। ऐसे सांपों को वापस जंगल 
में छोड़ देना चाहिए। 


सांप अच्छे पालतू बन सकते हैं -+ 


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